Mother defeat cancer and set a big examples in spite of many family issues 16142422

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दिव्यांग बेटे की बेबसी ने बढ़ाया आत्मबल, फिर अकेले ही जीती कैंसर से जंग

मंजू गुप्ता के पति की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। बेटा दानिश दिव्यांगता का शिकार था। लेकिन जब पता चला कि उन्हें भी कैंसर है तो वे टूट चुकी थी।

अमृतसर, [नितिन धीमान]। मौत को मात देने वाली मंजू की कहानी बहुत ही मार्मिक व संघर्षमय है। 1995 में सड़क हादसे ने सुहाग छीना तो जिंदगी तन्हा हो गई। इकलौते दिव्यांग बेटे के लिए जीने की कोशिश की लेकिन आठ साल बाद खुद कैंसर की चपेट में आ गई।

हर उम्मीद टूटती नजर आई, सोचा अब सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन बेटे के चेहरे को देख एक बार फिर जीने की ललक जगी और बेटे की मासूमियत ने ऐसा आत्मबल दिया। इसके बाद कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात देकर मंजू ने न केवल खुद को ‘पुनर्जीवित’ किया, बल्कि इस रोग से जिंदगी की जंग लड़ रहे लोगों को बचाने के लिए बीड़ा उठा समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई है।

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दरअसल, वेरका स्थित सरकारी गल्र्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल की हिंदी की अध्यापिका मंजू गुप्ता के पति राजीव गुप्ता की वर्ष 1995 में एक सड़क हादसे में मौत हो गईं। उस वक्त उनका बेटा दानिश सवा सवा साल का था। पति की मौत के बाद मंजू गुप्ता की जिंदगी तन्हा हो गई। ससुराल छूट गया। इकलौता बेटा दानिश भी जुबर्ट सिंड्रोम यानी 100 फीसदी दिव्यांगता का शिकार था। इस बीमारी में पूरी तरह से अंधापन, दिमाग का काम करना बंद कर देता है। शरीर का आधा हिस्सा नकारा हो जाता है। ससुराल छूटने के बाद मंजू अपने मायके नहीं गई। उन्होंने मजीठा रोड पर घर लिया और बेटे के साथ रहने लगी।

किसी तरह खुद को स्थापित कर मंजू गुप्ता बेटे की परवरिश कर रही थीं कि वर्ष 2013 में अचानक बीमार हो गईं।  शारीरिक परीक्षण करवाने पर पता चला कि उन्हें कैंसर है। मंजू बताती हैं कि उन्हें लगा कि अब सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन दिव्यांग बेटे दानिश के चेहरे ने उन्हें जीने की राह दिखाई। 

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मंजू बताती हैं कि डॉक्टर की सलाह पर सर्जरी करवाईं। घर आकर यही सोचती रही कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो दानिश का क्या होगा। मैंने अपने भीतर आत्मविश्वास पैदा किया। डॉक्टर द्वारा बताई गई सभी दवाएं नियमित रूप से ली। बेटा दानिश के चेहरे ने मेरा आत्मबल बढ़ाया। धीरे-धीरे मैंने कैंसर से जंग जीत ली।

दिव्यांग बेटे को भी बनाया काबिल

दिव्यांगता का शिकार दानिश बेशक आम बच्चों से भिन्न है, लेकिन वह हर वो काम कर सकता है जो सामान्य बच्चे भी नहीं कर पाते। मंजू गुप्ता बताती हैं कि सामान्यत: ऐसे बच्चों को स्पेशल स्कूल में भेजा जाता है, लेकिन उन्होंने उसे सरकारी स्कूल में ही दाखिला दिलवाया। दानिश ने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में क्रमश: 66 स 70 प्रतिशत अंक हासिल किए।

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इसके बाद सामान्य बच्चों की तरह ही आईटीआई में प्रवेश लिया। यहां 89 अंक अर्जित किए। आज दानिश 23 वर्ष का हो चुका है। उसने जिला तथा राज्य स्तरीय दौड़ मुकाबले में तीन गोल्ड मेडल तीन सिल्वर मेडल हासिल किए। वर्ष 2015 में जमशेदपुर में हुए नेशनल एथलेटिक में फुटबाल मुकाबले में उसने ब्रांज मैडल जीता है।

विगत 15 अगस्त को पंजाब सरकार ने दानिश को विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्तमान में वह प्राइमरी स्कूल तुंगबाला में सामान्य बच्चों को पढ़ाने जाता है। एक वालंटियर के रूप में स्वेच्छा से अध्यापन का कार्य कर रहा है। शाम को उनके घर स्लम क्षेत्रों के बच्चे पढ़ने आते हैं। 

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